कोरोना महामारी के एक साल बाद फ्रंटलाइन वॉरियर्स ने बताया अनुभव, बयां की चुनौती और साहस की कहानियां

कोरोना महामारी के एक साल बाद फ्रंटलाइन वॉरियर्स ने बताया अनुभव, बयां की चुनौती और साहस की कहानियां

Published on: 25/03/2021

कोरोना महामारी की आहट के साथ ही स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े डॉक्टर, नर्सिंगकर्मी दिन-रात जनता को बचाने की लड़ाई में लग गए. अब एक साल बाद ईटीवी भारत ने कुछ डॉक्टर्स और नर्सिंगकर्मियों से बातचीत कर उनके चुनौतीपूर्ण अनुभवों को जानने की कोशिश की. इसके बाद दोपहर 3 बजे उन पुलिस वालों का दास्तां भी सुनिए, जो दिन-रात सड़कों पर रहे ताकि हम और आप घरों में रह सकें और कोरोना संक्रमण से बच सकें.

बीते साल 24 मार्च की शाम प्रधानमंत्री मोदी के कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा करने के बाद रात 12 बजे देश का पहिया एकदम से थम गया. लॉकडाउन के बाद कोरोना संक्रमण से खुद को बचाने के लिए जहां सभी लोग घरों में कैद हो गए वहीं जनता के लिए स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े लोगों की चुनौतियां बढ़ गई.

स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े डॉक्टर, नर्सिंगकर्मी दिन-रात जनता को बचाने की लड़ाई में जुट गए. अब एक साल बीतने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े इन फ्रंटलाइन वर्कर्स का अनुभव कैसा रहा और इस दौरान डॉक्टरों ने किन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना किया. इन्हीं अनुभवों को ईटीवी भारत ने कुछ डॉक्टर्स और नर्सिंगकर्मी से बातचीत कर जानने की कोशिश की.

खुद संक्रमित हो गए थे LNJP अस्पताल एमडी
कोरोना काल के शुरुआती दिनों के अनुभवों को याद कर डॉक्टर आज भी सिहर उठते हैं. देश के सबसे बड़े कोरोना अस्पताल लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. सुरेश कुमार बताते हैं कि वह कोरोना के शुरुआती दिनों में खुद कोरोना संक्रमित हो गए थे. उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में लगा कि यह सब जल्दी खत्म हो जाएगा, लेकिन जब कोरोना के मामले बढ़ने लगे तो चिंता बढ़ने लगी.

covid situation

मानसिक दबाव में गुजरा ये साल
डॉ. कुमार आगे कहते हैं कि कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच हालात ऐसे थे कि डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मरीजों के पास जाने से डरते थे. हमारे ऊपर मानसिक दबाव था. उन्होंने बताया कि हमारे कई साथियों की कोरोना काल में मौत होने के बाद भी सभी चुनौतियों का डटकर सामना करते हुए हमने जिंदगियों को बचाने की पूरी कोशिश की.

लॉकडाउन में सांस लेने की नहीं थी फुरसतवहीं दिल्ली के तीरथ राम अस्पताल की डिप्टी मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. शिल्पा पण्डिता बताती हैं कि लॉकडाउन के बाद ये पूरा साल हमारे लिए बहुत व्यस्त रहा. उन्होंने कहा कि इस पूरे साल में एक दिन भी ऐसा नहीं रहा जब हमने घर पर बैठ कर आराम किया हो.

नर्सिंग स्टाफ की अपनी चुनौतियांकोरोना काल के शुरुआती दिनों के अनुभव बताते हुए तीरथ राम अस्पताल की नर्सिंग सुपरिटेंडेंट तबिता दास कहती हैं कि नर्सिंग स्टाफ के लिए दिन में 12 घंटे पीपीई किट पहनकर रहना काफी मुश्किल भरा था. उन्होंने कहा कि हमारे सामने दोतरफा चुनौती थी क्योंकि अगर पीपीई किट के बिना कोरोना का खतरा था तो पहनकर काम करना बेहद मुश्किल था.इसके साथ ही तीरथ राम अस्पताल के ही मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. जेपी सिंह बताते हैं कि कोरोना की रोकथाम के लिए लॉकडाउन कई मायनों में जरूरी था. उन्होंने बताया कि लॉकडाउन से पहले हमारे सामने हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कई दिक्कतें आई जिन्हें लॉकडाउन के दौरान हमने दूर किया.

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